Thursday, 4 May 2017

ऋषि मुनियों के देश में , अब अऋषि रहे ना कोय

व्यंग्य लेख – जग मोहन ठाकन
ऋषि मुनियों के देश में , अब अऋषि  रहे ना कोय
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बाबा रामदेव जी महाराज को आप चाहे योग गुरु कहें या संयोग गुरु ; उनके गुरु होने में कोई संदेह नहीं रह गया  है .बल्कि  महागुरू का ताज भी उनके मस्तक पर छोटा प्रतीत होता है .  हाँ , इतना भी निश्चित मानिये कि वो समय की नजाकत और नब्ज को टटोलते हुए ही बिलकुल सटीक कर्म –वचन –प्रवचन करते हैं . वे चाहे लंगोट धारण करें , चाहे नारी वस्त्र . वे  मूल भारतीय संस्कृति के संवाहक हैं  और पुनर्जागरण के पुरोधा भी .  उन द्वारा किये जा रहे योग प्रयोगों  तथा आयुर्वेदिक जड़ी –बूटियों  को वर्तमान भौतिक युग में भी आंग्ल चिकित्सा पद्धति के साथ प्रतियोगिता में आगे बढाने  के प्रयास करना  और प्राचीन भारतीय संस्कृति को पुनर्जीवित  करना उनका न केवल लक्ष्य है , अपितु  कर्म –धर्म भी बन गया है .
हरिद्वार में पतंजलि आयुर्वेदिक  रिसर्च इंस्टिट्यूट  का देश के प्रधान मंत्री माननीय  मोदी जी द्वारा  उदघाटन के  समय उन्होंने सिद्ध कर दिया कि वे वास्तव में गुरू हैं  और उन्होंने गुरू के पद के अनुसार ही आचरण करते हुए मोदी जी को राष्ट्र ऋषि की समय की मांग के अनुसार ‘सही समय पर सही उपाधि’ देकर भारतीय प्राचीन परम्परा का सही निर्वहन किया है . आने वाला इतिहास उन्हें हमेशा  याद करेगा .
 केवल एक योग्य गुरु ही तो यह प्रमाणित कर सकता  है कि कौन सा शिष्य किस उपाधि के लिए पात्र है . उन्होंने देशवासियों को यह कह कर कृतार्थ कर दिया कि –मोदी देश को एक वरदान के रूप में मिले हैं , उनका राष्ट्र ऋषि के रूप में सम्मान होना चाहिए . बाबा रामदेव ने यह भी कहा कि  आज पूरी दुनिया भारत का लोहा मान रही है . ( भले ही पड़ौसी प्लास्टिक भी ना मानते हों .)  प्रकाण्ड विद्वान् व गुरुजन किस भाषा में बात करते हैं , यह तो अभी शोध का विषय ही रहेगा . हम तो हमेशा से ही यही  सुनते आये हैं – खग की भाषा खग ही जाने .  
बाबा जी ने मोदी जी को राष्ट्र ऋषि घोषित कर उपाधियों का एक नया  मार्ग प्रशस्त किया है . अब उन्होंने पदम भूषण , पदम  विभूषण ,पदम श्री की तर्ज पर राष्ट्र ऋषि , प्रधान ऋषि , मुख्य ऋषि , राज ऋषि , प्रान्त ऋषि , जिला ऋषि , तहसील ऋषि , गाँव ऋषि , कृषि ऋषि , उद्योग ऋषि , राष्ट्र गुरू , महा गुरू ,विश्व गुरू आदि अनेकों उपाधियों का श्री गणेश किया है . अब सरकार या जो भी स्वयंभू गुरु जब चाहे किसी को उपरोक्त  ऋषि या गुरू उपाधियों से सुशोभित कर सकेगा . इसे कहते हैं नवाचार . अगर किसी राष्ट्र जन को आपत्ति ना हो तो  मैं भी स्वयं को राष्ट्रीय  व्यंग्य गुरु या व्यंग्य ऋषि घोषित करने का दु:साहस कर लूँ .
बाबा रामदेव की प्रधान मंत्री को  उपाधि प्रदान करने की उदारता को देखते हुए  अब सरकार को भी चाहिए कि योग (योग्य ) गुरू को तुरंत प्रमुख परामर्श ऋषि या राष्ट्र गुरु  के पद पर नियुक्त कर उपरोक्त  सभी उपाधियों के लागु करण की प्रक्रिया को शीघ्रातिशीघ्र  प्रारम्भ करे . 
प्राचीन भारतीय ऋषि मुनि  गृहस्थ आश्रम की परम्परा को निभाते हुए भी महर्षि  के पद सोपान तक पहुँच गए थे .कईयों ने इस परम्परा से थोड़ा हटकर परिवार –पत्नी  व राजपाट को छोड़कर भी महात्मा बुद्ध की तरह ऋषित्व का निर्वहन किया है . हालाँकि वर्तमान समय में (आईडिया थोड़ा चेंज) परिवार –पत्नी को छोड़ पाना तो आसान है , परन्तु राजपाट को छोड़ना थोड़ा कष्ट साध्य कार्य दिख रहा है . बल्कि पूर्व में जो व्यक्ति साधू ,साध्वी या महंत –योगी रह चुके हैं वो भी  आज राज ऋषि बन रहे हैं, राज-काज चला रहे हैं . यह एक नई प्रवृति पनप रही है . नई पहल है या यों कहें नवाचार (मोदी जी का प्रमुख लक्ष्य ) है . वास्तव में वे बेचारे समाज व देश हित में कितना बड़ा त्याग कर रहे हैं , आप तो शायद  सोच भी नहीं सकते . जी करता है बलिहारी जाऊं मैं तो उनके इस बलिदान पर .
भारतीय मान्यताओं की जहाँ तक मुझे समझ है , जब कोई व्यक्ति बिना किसी बाह्य लाग लपेट के,   दुःख –सुख को समान स्थिति मानते हुए , अपने शरीर –मन –विचार पर नियंत्रण कर लेता है, तो वो ऋषि बन जाता है . भारतीय  ऋषियों की कठोर तपस्या सदैव उदाहरणीय रही है . यहाँ तो ऐसे ऋषियों के उदाहरण भी उद्धरित किये जाते हैं कि वे तपस्या –समाधि में इतने लीन  हो जाते थे कि उनके शरीर के चहुँ ओर दीमक ने मिट्टी का आवरण चढ़ा दिया था . भारत के  ऋषि तपस्या को अत्यधिक महत्त्व देते रहे हैं . और वे अपने शरीर  , परिवेश  , स्वजन , स्वहित – परहित  सब कुछ भूल कर केवल और केवल  उस शक्ति को पाने हेतु  प्रयासरत रहते रहे हैं . और जब व्यक्ति उस परम शक्ति को पा लेता है तो ब्रह्मलीन  होकर ब्रह्म ऋषि हो जाता है  या यों भी कह सकते हैं कि वह पूरे ब्रह्माण्ड की सत्ता पर काबिज हो जाता है . जब तक वह राष्ट्र की सत्ता पर काबिज रहता है तब तक वह राष्ट्र ऋषि ही कहलाता है . हमारे प्रधान मंत्री मोदी जी में मुझे ब्रह्म ऋषि बनने की पूरी सम्भावनाये नजर आती हैं . शायद इसीलिए अब वे अपनी भगवा पताका को यू पी जैसे जातिगत प्रदेश में फहराकर योगी त्रिशूल  गाड़कर   अश्वमेघ के रास्ते पर चले हैं .देखते हैं राम के इस अश्वमेघ के घोड़े को रोकने वाला कोई लव –कुश मिलता भी है या नहीं ?  मोदी जी अभी तक तो राष्ट्र पताका फहराने का लक्ष्य लेकर निकले थे , परन्तु लगातार मिलती जा रही इस अखंड जीत से प्रफुल्लित हो  शायद वे  विश्व पताका को ही हाथ में न उठा लें .  खैर यह तो अभी भविष्य के गर्भ में है , परन्तु इतना तो आभास हो ही रहा है कि सब कुछ भगवा करण  करने के  चक्कर में कहीं ऐसा ना हो कि ऋषि मुनियों के इस देश में  अऋषि रहे ना कोय .
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Friday, 7 April 2017

THAKEN JAG MOHAN : किसकी शह पर बढ़ रहे हैं गौरक्षकों के होंसले ?

THAKEN JAG MOHAN : किसकी शह पर बढ़ रहे हैं गौरक्षकों के होंसले ?:       जग मोहन ठाकन ---------------------------------      किसकी शह पर कर रहे हैं गौरक्षक प्रहार ? २०१७ के अप्रैल माह के पहले ही द...

किसकी शह पर बढ़ रहे हैं गौरक्षकों के होंसले ?

     जग मोहन ठाकन
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किसकी शह पर कर रहे हैं गौरक्षक प्रहार ?
२०१७ के अप्रैल माह के पहले ही दिन कुछ अति उत्साही गौरक्षकों द्वारा राजस्थान के अलवर जिले में  कुछ वाहनों में भरकर ले जाये जा रहे गौ वंश को मुक्त कराने के उद्देश्य से  मुस्लिम व्यापारियों पर हमले की घटना उस समय अधिक तूल पकड़ गयी जब चोटिल व्यापारियों में से एक व्यक्ति पहलु खान ने सोमवार तीन अप्रैल को अस्पताल में दम तोड़ दिया . समाचारों के अनुसार पुलिस ने छः ज्ञात व २०० अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ धारा ३०२ के तहत मामला दर्ज कर लिया है . मृतक के परिवार वालों का कहना है कि व्यापारियों ने मेले से नियमानुसार पशुओं की  खरीद की थी . परन्तु प्रशासन राज्य में लागु १९९५ के कानून ( गौओं को हत्या के उद्देश्य से ले जाना  )  के तहत  इसे अपराध मान रही है . प्रदेश या देश में गौरक्षकों द्वारा हमले की यह कोई पहली घटना नहीं है . ऐसी ही कुछ घटनाओं से  विक्षुब्ध होकर देश के प्रधानमंत्री को यह कहना पड़ा था कि अधिकतर गौरक्षक असामाजिक तत्व हैं . प्रधानमंत्री का इतना कहने के बावजूद ऐसी कौन सी ताकत है जिसके बल पर गौरक्षक कानून को अपने हाथ में लेकर ऐसी कारवाई अभी भी जारी रखे हुए हैं . कौन  है जो गौरक्षकों को अभी भी  शह दे रहा है ?
यहाँ प्रश्न यह नहीं है कि गौ वंश को वैध रूप से ले जाया जा रहा था या अवैध रूप से . प्रश्न यह है कि क्या किसी भी व्यक्ति को कानून को एक तरफ रखकर अपने स्तर पर ही सजा देने का अधिकार है ?  क्या गौरक्षकों को यह अधिकार है कि वे अपने ही स्तर पर फैसला ले लें और व्यापारियों पर हमला बोल दें ? गौ रक्षकों को किसने यह अधिकार दिया है  कि वे स्वयं बिना पुलिस व प्रशासन को सूचित किये ही तथा बिना उनका सहयोग लिए ही अपने स्तर पर चेकिंग करें और पिटाई करें ? क्या राज्य सरकार की मशीनरी इतनी पंगु हो गयी है कि गौरक्षकों को अवैध व्यापार की रोक थाम के लिए स्वयं ड्यूटी देनी पड़े . ?
 कानून व्यवस्था के  अप्रभावी  होने के मामले में मुझे मोटे रूप  में तीन परिस्थितियां  नजर आती हैं. प्रथम तो वह स्थिति है जहाँ कानून , प्रशासन  व राजनैतिक सत्ता इतनी लचर हो जाती है कि लोगों को उस पर विश्वास ही नहीं रहता . और वे अपने स्तर पर ही कानून की व्याख्या करते हैं .  दूसरे परिवेश में लोग इतने उदण्ड हो जाते हैं कि उन्हें कानून , प्रशासन व राजनैतिक सत्ता का कोई भय नहीं रहता और वे स्वयं  को इन सबसे ऊपर  मानने लग जाते हैं . तीसरी वह स्थिति हो सकती है जब सत्ता व प्रशासन , जिन पर कानून का राज कायम करने की जिम्मेदारी है , तथा कानून तोड़ने वाले आपस में दूध में पानी की तरह मिल जाते हैं और सब कुछ दूधिया रंग का हो जाता है . जित देखूं तित लाल . खैर हमारे यहाँ कौन सी परिस्थिति है , पाठक ही निश्चित करें तो अच्छा .
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Friday, 24 March 2017

कुछ दिन तो गुजारो गुजरात माडल में - जग मोहन ठाकन

व्यंग्य लेख
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जग मोहन ठाकन
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कुछ  दिन तो गुजारो ;  गुजरात ( माडल ) में
कांग्रेस की तरह हर बार परीक्षा में फ़ेल होकर मुँह लटकाकर घर में चोरी छुप्पे घुसने वाला मेरा होनहार इस बार की अर्धवार्षिक परीक्षा में  पाँच विषयों में से केवल एक में ही उतीर्ण होकर जब घर आया तो उसके चेहरे पर उदासी नहीं बल्कि  आक्रोश था । एक पेपर में तो उसके कई साल से न जाने क्यों अंक  10 % से ऊपर नहीं चढ़ पा  रहे हैं ? एक अन्य पेपर , जिसमे वह पिछली परीक्षा में पास था, उसमे भी अबकी बार वह धराशाही हो गया । मुझे इस परीक्षा प्रणाली पर भी संदेह होने लगा है । मेरा होनहार दो विषयों में कक्षा मे सबसे अधिक नंबर  लेने के बावजूद परीक्षकों द्वारा फ़ेल घोषित कर दिया गया। और अजीब बात यह कि कक्षा के मेरे होनहार से कम नंबरों वाले दो दो तीन तीन छात्रों के अंकों को मिलाकर उन्हें सामूहिक रूप से उतीर्ण घोषित कर इनाम भी दे दिया गया । खैर इतना सब कुछ होने के बाद आक्रोशित होना उसका हक है । परंतु जब उसने आते ही  मुझसे 1900 रुपये एक पेन खरीदने के लिए मांगे, तो मैं हैरान रह गया । मैंने आंखे तरेरी और पूछा – क्या बात करते हो ? पेन और 1900 रुपये ? अर्रे , पेन तो पाँच –दस में ही आ जाता है ?
होनहार बोला – पापा आपका नेट काम नहीं करता क्या ?
अब उसे क्या बताऊँ कि हमारी सोच  के नेट तो उसी दिन से काम करना छोड़ गए थे , जिस दिन विद्या बालन ने कहना शुरू किया था –जहां सोच -वहाँ शौचालय
होनहार ने एक इश्तिहार मेरे सामने रख दिया जो उसने कहीं नेट की किसी साइट से डाउनलोड  किया था।  गुजराती  भाषा में छपे इस पर्चे में एक गुजराती मंदिर ने दावा किया बताया  है कि मंदिर द्वारा 1900 रुपये की कीमत पर बेची जा रही एक विशेष कलम (पेन) द्वारा दी गई परीक्षा में विद्यार्थी कभी फ़ेल नहीं होता । मंदिर ने तो यहाँ तक दावा किया है कि यदि इस कलम का प्रयोग करने के बावजूद भी परीक्षार्थी पास नहीं होता है, तो पैसे वापस कर दिये जाएंगे ।
 मेरे दिमाग के ढीले पड़ चुके नेट कुछ थरथराने लगे । गत वर्ष हरियाणा से राज्यसभा चुनाव में  भी एक विशेष प्रकार की पेन का इस्तेमाल किया गया था। अब मुझे कुछ कुछ यकीन होने लगा है कि वो गुजराती करामाती कलम ही रही होगी , जिसके सहारे कम वोटों के आसरे भी चुनाव लड़ने वाले बहुमत पा सके और चुनाव जीत कर धन्य हो गए । धन्य है गुजराती कलम , धन्य है गुजराती माडल । मित्रों , अब तो अमिताभ बच्चन का कहा मानकर कुछ दिन तो गुजारो गुजरात (माडल) में । हाँ , पर चीख चीख कर यू पी चुनाव में ई वी एम मशीन  पर सवाल उठाने वाली मायावती जी की बात भी सुन लो, कहीं वहाँ भी गुजराती माडल का प्रयोग तो नहीं किया गया है । क्योकि गुजराती माडल देता है परीक्षा में 100 %  सफलता की गारंटी ।
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Thursday, 2 March 2017

गाजर मूली के साथ धनिया मिर्ची फ्री - जग मोहन ठाकन

व्यंग्य -  जग मोहन ठाकन

गाजर मूली के साथ धनिया मिर्ची फ्री
गली में कई दिनों बाद नत्थू सब्जी वाले की आवाज़ सुनाई दी । देखा तो सामने नत्थू ही अपनी गधा-रेहड़ी पर सब्जी लादे आवाज़ लगा रहा है । मैंने पूछा – अरे नत्थू ! सब कुशल तो है ? कहीं चले गए थे क्या ?
नहीं साहब , हम कहाँ जा सकते हैं । बस अपने इस गधे को अपने एक रिश्तेदार के वहाँ यूपी में भेज दिया था । यहाँ तो कोई खास धंधा था नहीं , यू पी में गधों की कुछ ज्यादा ही डिमांड बढ़ गई थी । वैसे भी  वहाँ श्मशान घाट और कब्रिस्तान दोनों का काम ज़ोरों पर चल रहा था ,  सो इसे वहीं अपने एक रिश्तेदार के पास भेज दिया था । साहब ,जहां दो आने बचें, वहीं तो काम करना चाहिये ।
           मैंने यों ही पूछ लिया -  यू पी में कुछ ज्यादा ही काम की मारा मारी रही होगी , बेचारा गधा भी काफी कमजोर और थका थका सा लग रहा है । लगता है तेरे इस गधे को यू पी की हवा रास नहीं आई ।
अरे साहब , कुछ दिन यहाँ की आबो हवा में रहेगा , फिर ठीक हो जाएगा - नत्थू बोला ।
मैंने सलाह दी – अरे नत्थू , तू  गुजरात से कोई मोटा ताज़ा गधा क्यों नहीं ले आता ?  दिखने में भी सुंदर व स्मार्ट लगेगा और काम भी ज्यादा करेगा ।
अरे साहब , भगवान बचाए गुजरात के गधों से तो । हाथी के दाँत खाने के और  दिखाने के और । साहब गुजराती गधे ग्राहक मार होते हैं । दिखने में तो बड़े स्मार्ट और खड़े कान वाले दिखते हैं , पर काम के मामले में , बस पूरे काम चोर । फली तक नहीं फोड़ते ।  हाँ , ढिंचू ढिंचू करने, लंगड़ी मारने और उछल कूदकर कान उठाकर चलने में तो एकदम माहिर होते हैं गुजराती गधे  । नत्थू ने अपनी विशेषज्ञता दर्शाई ।
खैर छोड़ नत्थू गधों की बात, ताज़ा सब्जी कौन कौन सी है आज तेरे पास ? मैंने बात का रुख बदला ।
साहब , गाजर है , मूली है , आलू है , टमाटर है , गोभी है ,हरी मिर्ची है , हरा धनिया है , सारी हैं साहब । कुछ भी ले लो ।
पर मिर्ची और हरा धनिया तो गाजर मूली के साथ फ्री में ही देते होगे ? मैंने मोलभाव का रवैया अपनाया ।
अरे साहब , फ्री काहे  की , हर सब्जी की अपनी अपनी कीमत है । मिर्ची और धनिया के तो अब सबसे ज्यादा अच्छे दिन आए हुए हैं ,ये तो सभी दूसरी सब्जियों से ज्यादा महंगी हैं ।
नहीं भाई नत्थू ,यह नहीं हो सकता । हमारे देश के प्रधान मंत्री स्वयं कह रहे हैं कि अन्य सब्जियों के साथ हरी मिर्ची तथा हरा धनिया तो गिफ्ट के तौर पर फ्री में ही मिलता है । अभी अभी  तो यू पी  के चुनाव में बोला है । उन्होने एक चुनाव सभा में कहा है कि पाँच चरण के चुनाव में तो यू पी के मतदाताओं ने उन्हें खूब वोट दिये हैं और शेष दो चरणों में भी अपने वोट बोनस के रूप में सब्जी बेचने वाले की तरह ही धनिया और हरी मिर्ची की तरह फ्री में देंगे ।
मेरी बात सुनते ही नत्थू ने आँखेँ  तरेरी । बोला –तो  बाबूजी अब शेष दो चरणों की सब्जी धनिया व हरी मिर्ची की तरह फ्री में मांगी जा रही है , क्या पहले वाले पाँच चरणों की सब्जी खरीद की गई है ?
मैं सोच नहीं पा रहा हूँ , क्या जवाब दूँ । क्या आपके पास है  नत्थू के इस सवाल का जवाब ?
     जग मोहन ठाकन
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