Thursday, 8 June 2017
http://dastaktimes.org/archives/162841-my vyangya lekh-varishth jaad
http://dastaktimes.org/archives/162841
व्यंग्य लेख
वरिष्ठ जाड़ का दर्द
जग मोहन ठाकन
पिछले कुछ दिनों से ‘‘वरिष्ठ जाड़ ’’ की सन्सटीविटी कुछ ज्यादा ही बढ़ गई थी । ठण्डा खाओ तो दर्द , गर्म खाओ तो दर्द । इतनी भारी भरकम गर्मी में शरीर कहता है कि कुछ ठण्डा पिया जाये वर्ना डिहाइडरेसन का खतरा बढ़ जाता है । जीभ कहती है कि कुछ कूल-कूल हो जाये । विवाह शादियों का मौसम है . मुश्किल से ऐसे हालात बने हैं कि लोग निमंत्रण देने लगे हैं .
वैसे भी कहा जाता है कि ना जाने घोड़े और आदमी के कब दिन फिर जाएँ. कब राजभवन में पग फेरा हो जाए . जाड़ की किस्मत का भी यही हाल है . पता नहीं लगता कब नत्थू चाय वाले के पत्थर से सख्त लड्डू खाने पड़ जाएँ और कब राजभवन से दावत आ जाये .
और हाल में तो एक बहुत बड़ी दावत मिलने के आसार भी दिख रहे हैं . अन्य जाड़ें किसी भी हालत में इस दावत से वंचित नहीं होना चाहती . सहयोगी जाड़ें चाहती हैं कि इस दावत में कोई ठण्डा मीठा रसगुल्ला सा चबा लिया जाये । पर निगौड़ी ‘‘वरिष्ठ जाड़” है कि ठण्डे के नाम पर ही बिदकती है । ना जाने क्यों वह अन्य जाड़ों से जलन महसूस कर रही है . अन्य जाड़ें वरिष्ठ जाड़ को समय समय पर आभास भी करा रही हैं कि वह अब खोखली व बेकार हो चुकी है .पर खास बात यह है कि वरिष्ठ जाड यह मानने को भी तैयार नहीं है कि वह खोखली हो गयी है और अब मुंह में वह अवांछित हो चुकी है. वह अब भी वरिष्ठता के नाम पर अहम् पद पाना चाहती है . जैसे ही कोई अहम् खाद्य दिखता है , यह जाड़ जीभ को लार टपकाने को बाध्य कर देती है . हालाँकि वरिष्ठ जाड़ को बार बार यह अहसास भी कराया जा रहा है कि वह अब और स्वादिष्ट व्यंजनों का लोभ ना करे और चुप चाप एक कोने में बैठकर अन्य जाड़ों को व्यंजनों का स्वाद लेने दे .
पर क्या करें वरिष्ठ जाड़ के अड़ियल रवैये के कारण सब परेशान हैं, मगर वरिष्ठता के आगे सभी नमन करते हैं। कोई पहल नहीं करना चाहता । आखिर कुछ भी ना खा पाने के कारण शरीर की हालत पतली होती जा रही है । जीभ की अध्यक्षता में सभी दांतों व जाड़ों की मिटिंग बुलाई गई । चर्चा छिड़ी कि यदि कुछ भी ना खाया पिया गया तो शरीर समाप्त हो जायेगा और जब शरीर ही नहीं रहेगा तो हम कहां रहेंगें। हमारा अस्तित्व तो शरीर से ही जुड़ा है । जिस दिन शरीर समाप्त , उसी दिन लोग तो राम नाम सत्य बोलकर शरीर को अग्नि की भेंट चढ़ा देंगें और साथ ही हो जायेगा हमारा भी होलिका दहन ।
आखिर शरीर को बचाना जरूरी था, इसलिए फैसला लिया गया कि दर्द वाली वरिष्ठ जाड़ को निकलवा दिया जाये । शरीर ने डाक्टर से सलाह ली । दन्त चिकित्सक ने बताया कि वैसे तो वरिष्ठ जाड़ को कई दिन से पायरिया ने घेर रखा है , पर हाल में तो एक खतरनाक ‘ बाबरी’ कीड़ा भी वरिष्ठ जाड़ को खोखली कर रहा है . डॉक्टर ने आगाह किया कि शरीर हित में वरिष्ठ जाड़ निकलवाना ही श्रेयष्कर है। इस पर सहयोगी जाड़ों ने शंका जाहिर की कि वरिष्ठ जाड़ को निकालने पर शरीर को तो दर्द होगा ही , खून भी बह सकता है । और फिर जो खाली जगह बन जायेगी वो भी भद्दी लगेगी । वरिष्ठ जाड़ का खालीपन भी अखरेगा । डॉक्टर ने सहयोगी जाड़ों की चिंता भांपकर तुरन्त कहा -तुम निश्चिंत रहो । मैं ऐसी मसालेदार जाड़ सैट कर दूंगा कि किसी को भी फर्क पता तक नहीं चलेगा । भोजन को ऐसे कुतरेगी कि बाकी सहयोगी जाड़ें भी तरसने लगेंगी । जहां तक खून बहने की बात है वो भी निराधार है। इतनी पुरानी व अन्दर से खोखली हो चुकी जाड़ को निकालने में ना कोई खून बहता है ना कोई दर्द होता है । बस दो दिन की दिक्कत है। फिर से शरीर को पुष्ट भोजन मिलने लगेगा और जीभ को नव-स्वाद । दो दिन बाद सब सामान्य हो जायेगा । सभी जाड़- दांतों व जीभ ने शरीर हित में निर्णय ले लिया । ‘‘ वरिष्ठ जाड़” डाक्टर के कचरादान में पड़ी सोच रही थी कहां चूक हो गई । नवीनतम घटनाक्रम के अनुसार चिकित्सक के सहायक ने वरिष्ठ जाड़ की वरिष्ठता पर तरस खाते हुए जाड़ को कचरे से उठाकर डॉक्टर के टेबल के पास लगी श्योकेस में एक जार में रख दिया है । अब वरिष्ठ जाड़ खुश है कि अब वो भी समय आने पर अन्य खोखली जाड़ों को निकलते देख सकेगी ।
======
राजस्थान के अलवर में गौ रक्षा के नाम पर हत्या
---------------------------------------------------
जग मोहन ठाकन
==================================
पहलू खां की मौत –आखिर क्या है सी एम की चुप्पी का राज ?
राजस्थान की दबंग एवं सर्वाधिक मुखर मानी जाने वाली मुख्य मंत्री वसुंधरा राजे आखिर पहलू खान की हत्या पर चुप क्यों है ? यह प्रश्न आज प्रदेश एवं बाहर के उन सभी लोगों को उद्वेलित कर रहा है, जो राजे के स्वभाव को अच्छी तरह से जानते हैं . एक महिला मुख्यमंत्री को क्यों नहीं सुनाई पड़ रहा पहलू की विलापती माँ का रुदन ? समाज के जागरूक नागरिकों का आक्रोश , पीड़ित परिजनों का वेदन एवं विपक्ष का विधान सभा तथा संसद में हंगामा कैसे सी एम राजे के कानों के पर्दों के पार जाने में असरहीन हो रहा है ? २४ अप्रैल को विधान सभा के अन्दर मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के प्रतिनिधियों द्वारा उठाया गया पहलू खां का मुद्दा तथा विधान सभा के ठीक सामने वाम दलों एवं पीपल्स फॉर सिविल लिबर्टीज
यूनियन द्वारा इसी दिन से आयोजित तीन दिवसीय धरना पता नहीं क्यों सी एम राजे को उद्वेलित करने में नाकाम रहा है ?
प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष सचिन पायलट के नेतृत्व में प्रदेश के राज्यपाल कल्याण सिंह को भी पहलू खां के मामले में २१ अप्रैल को कांग्रेस पार्टी की तरफ से एक ज्ञापन दिया गया था , जिसमे पूरे प्रकरण की सीबीआई से जांच कराने की मांग की गयी है . पायलट ने सवाल उठाया है कि जब पहलु खान एवं उसके साथियों ने सरकार द्वारा अधिकृत पशु मेले से पशु खरीदे और वहां सक्षम अधिकारियों से खरीद –फरोख्त की रसीद ली गयी , तो कैसे इन पशुओं को तस्करी से जोड़ा जा रहा है ? पायलट पूछते हैं कि आखिर कौन है , जो हत्या के दोषियों को बचा रहा है ? पुलिस की अब तक की कारवाई पर संदेह व्यक्त करते हुए पायलट कहते हैं कि पुलिस की अभी तक की कारवाई तथा राज्य के गृह मंत्री के बयानों से तो ऐसा लगता है कि दोषियों को बचाने के प्रयास किये जा रहे हैं . उल्लेखनीय है कि राज्य के गृह मंत्री ने अलवर हत्या प्रकरण पर जो बयान दिया था उस पर भी काफी बवाल मचा था. पायलट प्रश्न खड़ा करते हैं कि २० दिन से अधिक का समय गुजर चुका है , पर न जाने क्यों राज्य की मुख्यमंत्री अभी तक राज्य के नागरिकों तथा पीड़ितों के परिवारों को न्याय का भरोसा दिला पाने में नाकाम रही हैं ?
यहाँ यह बता देना प्रासंगिक है कि अप्रैल की पहली ही तिथि को कुछ तथाकथित गौरक्षकों ने गौ वंशीय पशुओं को ले जा रहे वाहनों पर धावा बोलकर पशु ले जा रहे व्यक्तियों के साथ मारपीट की थी , जिसमे एक व्यक्ति पहलू खान चोट की वजह से दो दिन बाद चल बसा था . गौरक्षक पशु ले जा रहे व्यक्तियों को गौ तस्कर बता रहे थे , जबकि पहलू के परिजन कहते हैं कि वे पशु पालक हैं तथा कृषि के साथ साथ दुग्ध व्यवसाय भी करते हैं .
अप्रैल का शुरुआती दिन ही हरियाणा के मेवात क्षेत्र के इन पांच गौ क्रेताओं के लिए संकट का पहाड़ सिद्ध हुआ . उन्हें क्या पता था कि जयपुर के पशु मेले से खरीदे गए गौवंशीय पशु उनके एक साथी पहलु खां की मौत का पैगाम लेकर आये हैं .
समाचारों के अनुसार पुलिस ने छः ज्ञात व २०० अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ धारा ३०२ के तहत मामला दर्ज कर लिया है . मृतक के परिवार वालों का कहना है कि व्यापारियों ने मेले से नियमानुसार पशुओं की खरीद की थी . परन्तु प्रशासन व पुलिस राज्य में लागु १९९५ के कानून ( गौओं को हत्या के उद्देश्य से ले जाना ) के तहत इसे अपराध मान रही है . प्रदेश या देश में गौरक्षकों द्वारा हमले की यह कोई पहली घटना नहीं है . ऐसी ही कुछ घटनाओं से विक्षुब्ध होकर देश के प्रधानमंत्री को यह कहना पड़ा था कि अधिकतर गौरक्षक असामाजिक तत्व हैं . प्रधानमंत्री का इतना कहने के बावजूद ऐसी कौन सी ताकत है जिसके बल पर गौरक्षक कानून को अपने हाथ में लेकर ऐसी कारवाई अभी भी जारी रखे हुए हैं . कौन है जो गौरक्षकों को अभी भी शह दे रहा है ?
मीडिया में अलवर में वितरित किये गए कथित पम्फ्लेट्स के समाचार भी छपे हैं , जिनमे पहलू खां व साथियों पर किये गए हमले में शामिल लोगों को सामाजिक कार्यकर्ता बताया गया है . एक स्वम्भू गौ रक्षक साध्वी कमल के एक सोशल मीडिया पर विडियो का जिक्र भी मीडिया की सुर्खियाँ बना है , जिसमे साध्वी ने मुस्लिम डेरी किसानों पहलू खान व अन्य साथियों पर हमला करने वाले कथित गौरक्षकों की तुलना क्रांतिकारी भगत सिंह , चन्द्रशेखर आज़ाद तथा सुखदेव से की है .
पहलु खान हत्या मामले में आरोपित एक अन्य व्यक्ति विपिन यादव की भी साध्वी ने भगवान श्रीकृष्ण से बराबरी की है .
प्राप्त सूचना के अनुसार राजस्थान में जनवरी २००९ से फरवरी २०१६ तक सात वर्ष में गौ तस्करी के मामलों में लगभग ६४०० व्यक्ति गिरफ्तार किये गए तथा गौ तस्करी के ३००० केस दर्ज हुए , इन में से २५०० मामलों में कोर्ट में चालान प्रस्तुत किये गए . लगभग २७०० वाहन गौ तस्करी के आरोप में जब्त किये गए . वर्तमान में गौ तस्करी के औसतन ५०० मामले प्रतिवर्ष दर्ज हो रहे हैं .
यहाँ प्रश्न यह नहीं है कि गौ वंश को वैध रूप से ले जाया जा रहा है या अवैध रूप से . प्रश्न यह है कि क्या किसी भी व्यक्ति को कानून को एक तरफ रखकर अपने स्तर पर ही सजा देने का अधिकार है ? क्या कथित गौरक्षकों को यह अधिकार है कि वे अपने ही स्तर पर फैसला ले लें और व्यापारियों पर हमला बोल दें ? गौ रक्षकों को किसने यह अधिकार दिया है कि वे स्वयं बिना पुलिस व प्रशासन को सूचित किये ही तथा बिना उनका सहयोग लिए ही अपने स्तर पर चेकिंग करें और पिटाई करें ? क्या राज्य सरकार की मशीनरी इतनी पंगु हो गयी है कि गौरक्षकों को अवैध व्यापार की रोक थाम के लिए स्वयं ड्यूटी देनी पड़े . ?
कानून व्यवस्था के अप्रभावी होने के मामले में मोटे रूप में तीन परिस्थितियां नजर आती हैं. प्रथम तो वह स्थिति है जहाँ कानून , प्रशासन व राजनैतिक सत्ता इतनी लचर हो जाती है कि लोगों को उस पर विश्वास ही नहीं रहता और वे अपने स्तर पर ही कानून की व्याख्या करते हैं . दूसरे परिवेश में लोग इतने उदण्ड हो जाते हैं कि उन्हें कानून , प्रशासन व राजनैतिक सत्ता का कोई भय नहीं रहता और वे स्वयं को इन सबसे ऊपर मानने लग जाते हैं . तीसरी वह स्थिति हो सकती है जब सत्ता व प्रशासन , जिन पर कानून का राज कायम करने की जिम्मेदारी है , तथा कानून तोड़ने वाले आपस में दूध में पानी की तरह मिल जाते हैं और सब कुछ दूधिया रंग का हो जाता है .
आखिर कथित गौरक्षकों का उद्देश्य क्या है ? क्या वे वास्तव में गौरक्षा के लिए इतने चिंतिंत हैं कि वे सारे होश हवास व कानून कायदे भूलकर जान की बाजी लगाकर अगले पक्ष की जान भी लेने से नहीं कतराते ? यदि हाँ , तो क्यों नहीं सारे दिन गलियों व कूड़े के ढेर पर पॉलिथीन में अपनी क्षुधा शांत करने हेतु मुह मारती ये लाचार गायें इन भक्तों को दिखाई देती ? क्यों नहीं इन आवारा गायों को ये गौ भक्त अपने घरों में आसरा दे देते ? हिंदुत्व को प्रमुख एजेंडा मानने वाली व गौओं के लिए सर्वाधिक चिंता जताने वाली सरकारे क्यों नहीं अपने ही राजकीय कोष से सहयाता प्राप्त गौशालाओं में भूख व ख़राब वातावरण के कारण मरने वाली सैंकड़ों गायो की जिंदगी बचा पाती हैं ? क्यों नहीं होती है इन मौतों की जांच व कारवाई ?
प्रश्न पूछे जा रहे हैं कि कहीं कथित गौ चिन्तक गौरक्षा के नाम पर किसी “हिडन” राजनैतिक एजेंडा के तहत समाज का धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण तो नहीं करना चाहते हैं ? देश में आज के दिन राज करने वाली पार्टी भाजपा दोहरे मानदंड अपना कर क्या सिद्ध करना चाहती है ? एक तरफ तो अपने शाषित प्रदेशों में गौरक्षा को अपना प्रमुख एजेंडा बनाये हुए है, दूसरी तरफ उसके ही कुछ नेता पूर्वोत्तर राज्यों में गौवध की छूट का अलग ही राग अलाप रहे है . आशंका जताई जा रही है कि चुनाव पूर्व भाषणों में जम्मू कश्मीर से धारा ३७० को हटाने की पक्षधर भाजपा कहीं अपने ही दोहरे आचरण की वजह से पूर्वोत्तर राज्यों को भी कोई विशेष धारा से न जोड़ दे ? उत्तर प्रदेश में हिंदुत्व के एजेंडा को आगे रखकर भारी जीत हासिल करने वाली भाजपा को यह तो ध्यान रखना ही होगा कि देश हित व मानव हित सर्वोपरि हैं . कहीं हम इनकी उल्लंघना तो नहीं कर रहे हैं ?
======
Sunday, 7 May 2017
Thursday, 4 May 2017
ऋषि मुनियों के देश में , अब अऋषि रहे ना कोय
व्यंग्य लेख – जग मोहन ठाकन
ऋषि मुनियों के देश में , अब अऋषि रहे
ना कोय
--------------------------------------------------------
बाबा रामदेव जी महाराज को आप चाहे योग गुरु कहें या संयोग गुरु ; उनके “ गुरु” होने में कोई संदेह नहीं
रह गया है .बल्कि महागुरू का ताज भी उनके मस्तक पर छोटा प्रतीत
होता है . हाँ , इतना भी निश्चित मानिये
कि वो समय की नजाकत और नब्ज को टटोलते हुए ही बिलकुल सटीक कर्म –वचन –प्रवचन करते
हैं . वे चाहे लंगोट धारण करें , चाहे नारी वस्त्र . वे मूल भारतीय संस्कृति के संवाहक हैं और पुनर्जागरण के पुरोधा भी . उन द्वारा किये जा रहे योग प्रयोगों तथा आयुर्वेदिक जड़ी –बूटियों को वर्तमान भौतिक युग में भी आंग्ल चिकित्सा
पद्धति के साथ प्रतियोगिता में आगे बढाने
के प्रयास करना और प्राचीन भारतीय
संस्कृति को पुनर्जीवित करना उनका न केवल
लक्ष्य है , अपितु कर्म –धर्म भी बन गया
है .
हरिद्वार में पतंजलि आयुर्वेदिक
रिसर्च इंस्टिट्यूट का देश के
प्रधान मंत्री माननीय मोदी जी द्वारा उदघाटन के
समय उन्होंने सिद्ध कर दिया कि वे वास्तव में “गुरू” हैं और उन्होंने गुरू के पद के अनुसार ही आचरण करते
हुए मोदी जी को “राष्ट्र ऋषि” की समय की मांग के अनुसार ‘सही समय पर सही उपाधि’ देकर
भारतीय प्राचीन परम्परा का सही निर्वहन किया है . आने वाला इतिहास उन्हें
हमेशा याद करेगा .
केवल एक योग्य गुरु ही तो यह प्रमाणित
कर सकता है कि कौन सा शिष्य किस उपाधि के
लिए पात्र है . उन्होंने देशवासियों को यह कह कर कृतार्थ कर दिया कि –मोदी देश को
एक वरदान के रूप में मिले हैं , उनका राष्ट्र ऋषि के रूप में सम्मान होना चाहिए .
बाबा रामदेव ने यह भी कहा कि आज पूरी
दुनिया भारत का लोहा मान रही है . ( भले ही पड़ौसी प्लास्टिक भी ना मानते हों
.) प्रकाण्ड विद्वान् व गुरुजन किस भाषा
में बात करते हैं , यह तो अभी शोध का विषय ही रहेगा . हम तो हमेशा से ही यही सुनते आये हैं – खग की भाषा खग ही जाने .
बाबा जी ने मोदी जी को राष्ट्र ऋषि घोषित कर “उपाधियों” का एक नया मार्ग प्रशस्त किया है . अब उन्होंने पदम भूषण
, पदम विभूषण ,पदम श्री की तर्ज पर
राष्ट्र ऋषि , प्रधान ऋषि , मुख्य ऋषि , राज ऋषि , प्रान्त ऋषि , जिला ऋषि , तहसील
ऋषि , गाँव ऋषि , कृषि ऋषि , उद्योग ऋषि , राष्ट्र गुरू , महा गुरू ,विश्व गुरू
आदि अनेकों उपाधियों का श्री गणेश किया है . अब सरकार या जो भी स्वयंभू गुरु जब
चाहे किसी को उपरोक्त “ऋषि या गुरू” उपाधियों से सुशोभित कर
सकेगा . इसे कहते हैं नवाचार . अगर किसी राष्ट्र जन को आपत्ति ना हो तो मैं भी स्वयं को राष्ट्रीय व्यंग्य गुरु या व्यंग्य ऋषि घोषित करने का दु:साहस
कर लूँ .
बाबा रामदेव की प्रधान मंत्री को
उपाधि प्रदान करने की उदारता को देखते हुए
अब सरकार को भी चाहिए कि योग (योग्य ) गुरू को तुरंत प्रमुख परामर्श ऋषि या
राष्ट्र गुरु के पद पर नियुक्त कर उपरोक्त
सभी उपाधियों के लागु करण की प्रक्रिया को
शीघ्रातिशीघ्र प्रारम्भ करे .
प्राचीन भारतीय ऋषि मुनि गृहस्थ आश्रम
की परम्परा को निभाते हुए भी महर्षि के पद
सोपान तक पहुँच गए थे .कईयों ने इस परम्परा से थोड़ा हटकर परिवार –पत्नी व राजपाट को छोड़कर भी महात्मा बुद्ध की तरह
ऋषित्व का निर्वहन किया है . हालाँकि वर्तमान समय में (“आईडिया थोड़ा चेंज”) परिवार –पत्नी को छोड़ पाना तो आसान है , परन्तु राजपाट को छोड़ना थोड़ा कष्ट
साध्य कार्य दिख रहा है . बल्कि पूर्व में जो व्यक्ति साधू ,साध्वी या महंत –योगी
रह चुके हैं वो भी आज राज ऋषि बन रहे हैं,
राज-काज चला रहे हैं . यह एक नई प्रवृति पनप रही है . नई पहल है या यों कहें
नवाचार (मोदी जी का प्रमुख लक्ष्य ) है . वास्तव में वे बेचारे समाज व देश हित में
कितना बड़ा त्याग कर रहे हैं , आप तो शायद सोच भी नहीं सकते . जी करता है बलिहारी जाऊं मैं
तो उनके इस बलिदान पर .
भारतीय मान्यताओं की जहाँ तक मुझे समझ है , जब कोई व्यक्ति बिना किसी बाह्य
लाग लपेट के, दुःख –सुख को समान स्थिति
मानते हुए , अपने शरीर –मन –विचार पर नियंत्रण कर लेता है, तो वो ऋषि बन जाता है .
भारतीय ऋषियों की कठोर तपस्या सदैव
उदाहरणीय रही है . यहाँ तो ऐसे ऋषियों के उदाहरण भी उद्धरित किये जाते हैं कि वे
तपस्या –समाधि में इतने लीन हो जाते थे कि
उनके शरीर के चहुँ ओर दीमक ने मिट्टी का आवरण चढ़ा दिया था . भारत के ऋषि तपस्या को अत्यधिक महत्त्व देते रहे हैं .
और वे अपने शरीर , परिवेश , स्वजन , स्वहित – परहित सब कुछ भूल कर केवल और केवल उस शक्ति को पाने हेतु प्रयासरत रहते रहे हैं . और जब व्यक्ति उस परम
शक्ति को पा लेता है तो ब्रह्मलीन होकर
ब्रह्म ऋषि हो जाता है या यों भी कह सकते
हैं कि वह पूरे ब्रह्माण्ड की सत्ता पर काबिज हो जाता है . जब तक वह राष्ट्र की
सत्ता पर काबिज रहता है तब तक वह राष्ट्र ऋषि ही कहलाता है . हमारे प्रधान मंत्री
मोदी जी में मुझे ब्रह्म ऋषि बनने की पूरी सम्भावनाये नजर आती हैं . शायद इसीलिए
अब वे अपनी भगवा पताका को यू पी जैसे जातिगत प्रदेश में फहराकर “योगी” त्रिशूल गाड़कर
अश्वमेघ के रास्ते पर चले हैं .देखते हैं “राम” के इस अश्वमेघ के घोड़े को
रोकने वाला कोई लव –कुश मिलता भी है या नहीं ?
मोदी जी अभी तक तो राष्ट्र पताका फहराने का लक्ष्य लेकर निकले थे , परन्तु
लगातार मिलती जा रही इस अखंड जीत से प्रफुल्लित हो शायद वे
विश्व पताका को ही हाथ में न उठा लें .
खैर यह तो अभी भविष्य के गर्भ में है , परन्तु इतना तो आभास हो ही रहा है
कि सब कुछ भगवा करण करने के चक्कर में कहीं ऐसा ना हो कि ऋषि मुनियों के इस
देश में अऋषि रहे ना कोय .
====
Subscribe to:
Posts (Atom)



