Friday, 24 March 2017

कुछ दिन तो गुजारो गुजरात माडल में - जग मोहन ठाकन

व्यंग्य लेख
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जग मोहन ठाकन
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कुछ  दिन तो गुजारो ;  गुजरात ( माडल ) में
कांग्रेस की तरह हर बार परीक्षा में फ़ेल होकर मुँह लटकाकर घर में चोरी छुप्पे घुसने वाला मेरा होनहार इस बार की अर्धवार्षिक परीक्षा में  पाँच विषयों में से केवल एक में ही उतीर्ण होकर जब घर आया तो उसके चेहरे पर उदासी नहीं बल्कि  आक्रोश था । एक पेपर में तो उसके कई साल से न जाने क्यों अंक  10 % से ऊपर नहीं चढ़ पा  रहे हैं ? एक अन्य पेपर , जिसमे वह पिछली परीक्षा में पास था, उसमे भी अबकी बार वह धराशाही हो गया । मुझे इस परीक्षा प्रणाली पर भी संदेह होने लगा है । मेरा होनहार दो विषयों में कक्षा मे सबसे अधिक नंबर  लेने के बावजूद परीक्षकों द्वारा फ़ेल घोषित कर दिया गया। और अजीब बात यह कि कक्षा के मेरे होनहार से कम नंबरों वाले दो दो तीन तीन छात्रों के अंकों को मिलाकर उन्हें सामूहिक रूप से उतीर्ण घोषित कर इनाम भी दे दिया गया । खैर इतना सब कुछ होने के बाद आक्रोशित होना उसका हक है । परंतु जब उसने आते ही  मुझसे 1900 रुपये एक पेन खरीदने के लिए मांगे, तो मैं हैरान रह गया । मैंने आंखे तरेरी और पूछा – क्या बात करते हो ? पेन और 1900 रुपये ? अर्रे , पेन तो पाँच –दस में ही आ जाता है ?
होनहार बोला – पापा आपका नेट काम नहीं करता क्या ?
अब उसे क्या बताऊँ कि हमारी सोच  के नेट तो उसी दिन से काम करना छोड़ गए थे , जिस दिन विद्या बालन ने कहना शुरू किया था –जहां सोच -वहाँ शौचालय
होनहार ने एक इश्तिहार मेरे सामने रख दिया जो उसने कहीं नेट की किसी साइट से डाउनलोड  किया था।  गुजराती  भाषा में छपे इस पर्चे में एक गुजराती मंदिर ने दावा किया बताया  है कि मंदिर द्वारा 1900 रुपये की कीमत पर बेची जा रही एक विशेष कलम (पेन) द्वारा दी गई परीक्षा में विद्यार्थी कभी फ़ेल नहीं होता । मंदिर ने तो यहाँ तक दावा किया है कि यदि इस कलम का प्रयोग करने के बावजूद भी परीक्षार्थी पास नहीं होता है, तो पैसे वापस कर दिये जाएंगे ।
 मेरे दिमाग के ढीले पड़ चुके नेट कुछ थरथराने लगे । गत वर्ष हरियाणा से राज्यसभा चुनाव में  भी एक विशेष प्रकार की पेन का इस्तेमाल किया गया था। अब मुझे कुछ कुछ यकीन होने लगा है कि वो गुजराती करामाती कलम ही रही होगी , जिसके सहारे कम वोटों के आसरे भी चुनाव लड़ने वाले बहुमत पा सके और चुनाव जीत कर धन्य हो गए । धन्य है गुजराती कलम , धन्य है गुजराती माडल । मित्रों , अब तो अमिताभ बच्चन का कहा मानकर कुछ दिन तो गुजारो गुजरात (माडल) में । हाँ , पर चीख चीख कर यू पी चुनाव में ई वी एम मशीन  पर सवाल उठाने वाली मायावती जी की बात भी सुन लो, कहीं वहाँ भी गुजराती माडल का प्रयोग तो नहीं किया गया है । क्योकि गुजराती माडल देता है परीक्षा में 100 %  सफलता की गारंटी ।
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Thursday, 2 March 2017

गाजर मूली के साथ धनिया मिर्ची फ्री - जग मोहन ठाकन

व्यंग्य -  जग मोहन ठाकन

गाजर मूली के साथ धनिया मिर्ची फ्री
गली में कई दिनों बाद नत्थू सब्जी वाले की आवाज़ सुनाई दी । देखा तो सामने नत्थू ही अपनी गधा-रेहड़ी पर सब्जी लादे आवाज़ लगा रहा है । मैंने पूछा – अरे नत्थू ! सब कुशल तो है ? कहीं चले गए थे क्या ?
नहीं साहब , हम कहाँ जा सकते हैं । बस अपने इस गधे को अपने एक रिश्तेदार के वहाँ यूपी में भेज दिया था । यहाँ तो कोई खास धंधा था नहीं , यू पी में गधों की कुछ ज्यादा ही डिमांड बढ़ गई थी । वैसे भी  वहाँ श्मशान घाट और कब्रिस्तान दोनों का काम ज़ोरों पर चल रहा था ,  सो इसे वहीं अपने एक रिश्तेदार के पास भेज दिया था । साहब ,जहां दो आने बचें, वहीं तो काम करना चाहिये ।
           मैंने यों ही पूछ लिया -  यू पी में कुछ ज्यादा ही काम की मारा मारी रही होगी , बेचारा गधा भी काफी कमजोर और थका थका सा लग रहा है । लगता है तेरे इस गधे को यू पी की हवा रास नहीं आई ।
अरे साहब , कुछ दिन यहाँ की आबो हवा में रहेगा , फिर ठीक हो जाएगा - नत्थू बोला ।
मैंने सलाह दी – अरे नत्थू , तू  गुजरात से कोई मोटा ताज़ा गधा क्यों नहीं ले आता ?  दिखने में भी सुंदर व स्मार्ट लगेगा और काम भी ज्यादा करेगा ।
अरे साहब , भगवान बचाए गुजरात के गधों से तो । हाथी के दाँत खाने के और  दिखाने के और । साहब गुजराती गधे ग्राहक मार होते हैं । दिखने में तो बड़े स्मार्ट और खड़े कान वाले दिखते हैं , पर काम के मामले में , बस पूरे काम चोर । फली तक नहीं फोड़ते ।  हाँ , ढिंचू ढिंचू करने, लंगड़ी मारने और उछल कूदकर कान उठाकर चलने में तो एकदम माहिर होते हैं गुजराती गधे  । नत्थू ने अपनी विशेषज्ञता दर्शाई ।
खैर छोड़ नत्थू गधों की बात, ताज़ा सब्जी कौन कौन सी है आज तेरे पास ? मैंने बात का रुख बदला ।
साहब , गाजर है , मूली है , आलू है , टमाटर है , गोभी है ,हरी मिर्ची है , हरा धनिया है , सारी हैं साहब । कुछ भी ले लो ।
पर मिर्ची और हरा धनिया तो गाजर मूली के साथ फ्री में ही देते होगे ? मैंने मोलभाव का रवैया अपनाया ।
अरे साहब , फ्री काहे  की , हर सब्जी की अपनी अपनी कीमत है । मिर्ची और धनिया के तो अब सबसे ज्यादा अच्छे दिन आए हुए हैं ,ये तो सभी दूसरी सब्जियों से ज्यादा महंगी हैं ।
नहीं भाई नत्थू ,यह नहीं हो सकता । हमारे देश के प्रधान मंत्री स्वयं कह रहे हैं कि अन्य सब्जियों के साथ हरी मिर्ची तथा हरा धनिया तो गिफ्ट के तौर पर फ्री में ही मिलता है । अभी अभी  तो यू पी  के चुनाव में बोला है । उन्होने एक चुनाव सभा में कहा है कि पाँच चरण के चुनाव में तो यू पी के मतदाताओं ने उन्हें खूब वोट दिये हैं और शेष दो चरणों में भी अपने वोट बोनस के रूप में सब्जी बेचने वाले की तरह ही धनिया और हरी मिर्ची की तरह फ्री में देंगे ।
मेरी बात सुनते ही नत्थू ने आँखेँ  तरेरी । बोला –तो  बाबूजी अब शेष दो चरणों की सब्जी धनिया व हरी मिर्ची की तरह फ्री में मांगी जा रही है , क्या पहले वाले पाँच चरणों की सब्जी खरीद की गई है ?
मैं सोच नहीं पा रहा हूँ , क्या जवाब दूँ । क्या आपके पास है  नत्थू के इस सवाल का जवाब ?
     जग मोहन ठाकन
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Tuesday, 17 January 2017

hindi vyangya - delete gandhi - paste modi

व्यंग्य ---जग मोहन ठाकन
डिलीट गांधी –पेस्ट मोदी
खादी ग्रामोद्योग के कलेंडर –डायरी से गांधी जी की फोटो डिलीट कर मोदी जी की फोटो पेस्ट कर देने मात्र से न जाने कुछ लोगों के पेट में क्यों मरोड़े उठने लगे हैं । समय बड़ी तेज़ी से बदल रहा है । इतने लंबे अरसे तक गांधी जी को चरखे पर सूत कातने की ड्यूटी संभलवाई गई थी ,क्या वे अपनी ड्यूटी सही ढंग से निभा पाये  ? क्या उन्होने देश के लिए जरूरत के मुताबिक सूत काता ?नहीं न ? जो व्यक्ति इतने सालों तक सूत कातने का उपक्रम करता रहा , वो अपना ही तन आज तक नहीं ढाँप पाया , वो भला कैसे आम आदमी को वस्त्र दे पाएगा ?गांधी जी ने चरखे की गति बड़ी ही धीमी रखी है , यह भी अलग से जांच का विषय है , हम इस पर भी सोचेंगे। इसमे भी किसी राजनैतिक दल  की चाल परिलक्षित हो रही है । आज भी कुछ दल चाहते हैं कि गांधी जी के चरखे की गति धीमी रहे और आम आदमी यों ही नंग धड़ंग फिरता रहे । परंतु भाइयो और बहनों , आज युग परिवर्तन का दौर है , हमे पुराने खादी वस्त्रों की जगह नए दस दस लाख वाले वस्त्र चाहिए । विदेशों में हमारी साख का सवाल है । अब तुम ही बताओ , जिस व्यक्ति ने कभी दस लाख का सूट देखा ही नहीं वो भला कैसे कात पाएगा चरखे पर उस सूट का धागा ? नहीं न ?
अब गांधी जी के हाथ ढीले प चुके हैं । पता है क्यों ? क्योंकि असली हाथ –किसी और के साथ । अब नकली हाथों के सहारे कब तक चलेगा चरखा ? अतः अब गांधी जी को विश्राम की जरूरत है । क्या भला यह अच्छा लगता है कि डेढ़ सौ वर्ष की इस उम्र में भी हम अपने पूजनीय पूर्वज से सूत कतवायेँ ? नहीं न मित्रों ? यह तो सरासर अन्याय है , हमारी संस्कृति के खिलाफ है । यह जरूर किसी 70 साल तक राज करने वाली पार्टी की हमारी संस्कृति का क्षरण करने की साजिश है । परंतु मित्रों हम यह नहीं होने देंगे । एक बापू इस वृद्धावस्था में भी चरखा चलाने को विवश हो और औलाद हाथ पर हाथ धरे देखती रहे , यह हमसे सहन नहीं होगा । भले ही हमें खुद ही चरखा क्यों न चलाना पड़े । वैसे भी हमने गांधी जी के चश्मे को तो पहले ही स्वच्छ भारत की निगरानी के लिए डेप्यूट कर दिया है , अब भला बिना चश्मे के गांधी जी कैसे कात पाएंगे सूत ?
विरोधी पार्टियां हो सकता है हम पर आरोप लगाएँ कि हमें चरखा नहीं चलाना आएगा । हमने पुराने चरखे को हटाकर नया चरखा लगाया है , जो कि ऑटोमैटिक है , हमें तो केवल इसके पास बैठकर फोटो खिंचवाना है । हमने तो पुराने ढर्रे के नोटों को एक ही झटके में प्रचलन से बाहर करके दुनियाँ को दिखा दिया है कि हम सारे घर के पर्दे बदल सकते हैं । लोग नोटबन्दी के बाद छपे कुछ नए नोटों पर भी गांधी जी की तस्वीर न छपी होने का राग अलापते रहे हैं । हमने सब को लाइन में लगा दिया है । भाइयो बहनों पुराने विचारों को त्यागिये और नवयुग में प्रवेश कीजिये । आपको नोटों का करना ही क्या है ? कैश लेस हो जाइये । न रहेगा बांस , न बजेगी बांसुरी । हम हमारी वसुधैव कुटुंबकम की  नीति का अनुसरण कर रहे हैं । जिस पड़ौसी देश का हमारे साथ सदैव कटुता पूर्ण व्यवहार रहता था , आज वो ही हमें पेटीएम दे रहा है । है न अचरजपूर्ण बदलाव । युग बदल रहा ,जग बदल रहा ,फिर तुम बदलो क्या नई बात । भाइयो बहनों हमने ऐसी ताली बजाई है कि देखते जाओ सारी विदेशी कंपनियाँ आपकी गलियों में आपके आगे नतमस्तक हो जाएंगी । बस चरखे की कताई देखो , कातने वाले को नहीं । हम हर नागरिक को चरखा चलाने का अधिकार देना चाहते है और वो भी अपनी  सेल्फी के साथ ।  

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Sunday, 25 December 2016

राजस्थान से जग मोहन ठाकन
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तो क्या फिर भड़केगी गुर्जर आरक्षण की आग ?
---------------------------------------------------गुर्जर फिर स्तब्ध हैं और नौ  साल की लंबी अवधि की लड़ाई के बाद पुनः जहां से चले थे वहीं पहुँच गए हैं । राजस्थान हाई कोर्ट ने गुर्जर सहित पाँच जातियों को   एसबीसी में पाँच प्रतिशत आरक्षण देने के अधिनियम -2015 को रद्द कर गुर्जर आरक्षण पर खुशियाँ मना रहे गुर्जर नेताओं को एक ज़ोर का झटका धीरे से दे दिया है ।  हाल में नौ  दिसम्बर ,2016 को दिये गए एक अहम फैसले में राजस्थान हाई कोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा गुर्जर सहित पाँच जातियों  गाड़िया लोहार , बंजारा , रेबारी तथा राईका को एसबीसी ( विशेष पिछड़ा वर्ग ) में अधिनियम -2015 के तहत पाँच प्रतिशत का अलग से आरक्षण देने के फैसले को रद्द कर दिया है । हाई कोर्ट ने ओ बी सी  कमिशन की रिपोर्ट को भी अपर्याप्त बताया । पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट पर गंभीर सवाल उठाते हुए कोर्ट ने कहा कि आयोग ने बिना पूरे आंकड़े जुटाये ही सिफारिस कर दी । रिपोर्ट के अनुसार 82 में से 25 जातियों के बारे में आंकड़े ही नहीं थे और बाकी जातियों के लिए भी विकास अध्ययन संस्थान (आई डी एस ) ने जो आंकड़े जुटाये वे भी वैज्ञानिक तरीके से नहीं जुटाये गए ।
  कोर्ट ने यह आदेश कैप्टन गुर्विन्दर सिंह तथा अन्य की याचिकायों का निपटारा करते हुए दिया है । ओ बी सी कमिशन की रिपोर्ट को गलत करार देते हुए कोर्ट ने कहा कि इस रिपोर्ट में खामी है और उसके आधार पर आरक्षण देना न्याय संगत नहीं है । कोर्ट ने निर्णय दिया कि आरक्षण  में पचास फीसदी सीमा का उल्लंघन नहीं किया जा सकता और न ही राज्य सरकार पचास फीसदी से ज्यादा आरक्षण दे सकती है । याचिका कर्ताओं ने गुर्जर समेत पाँच जातियों को विशेष पिछड़ा वर्ग के तहत अलग से पाँच प्रतिशत आरक्षण देने के राज्य सरकार के अधिनियम -2015 को इस आधार पर चुनौती दी थी कि इस फैसले से राज्य में आरक्षण की सीमा पचास प्रतिशत से अधिक हो गई है । उधर राज्य सरकार ने अपनी पैरवी मे तर्क दिया कि सरकार ने आई डी एस से सर्वे करवा कर ओ बी सी आयोग के समक्ष तथ्य रखे थे , जिसके आधार पर ही ओ बी सी आयोग ने इस विशेष पाँच प्रतिशत के आरक्षण की सिफारिस की थी । सरकार का तर्क था कि विशेष परिस्थितियों में राज्य सरकार पचास फीसदी से अधिक आरक्षण दे सकती है । परंतु कोर्ट  ने सरकार के इन तर्कों के विरुद्ध एस बी सी के पाँच प्रतिशत आरक्षण को खारिज कर दिया । प्राप्त संकेतों के अनुसार राज्य सरकार हाई कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी कर रही है ।
 क्या है मामला ?
गुर्जर जाति पहले से ही राजस्थान में पिछड़ा वर्ग में शामिल है और वहाँ  21 प्रतिशत के ओ बी सी वर्ग में आरक्षके  तहत लाभ ले रही थी । परंतु गुर्जरों को लगा कि उन्हें अन्य जिन जातियों से ओ बी सी श्रेणी में प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है , वे उसमे पिछड़ रहे हैं तथा उन्हें उनके हक के अनुपात में राजकीय सेवाओं में उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा है । विशेष कर  जब से राज्य में जाटों को ओ बी सी में शामिल किया गया है तभी से ओ बी सी वर्ग की मेरिट ऊपर चढ़ने लगी है तथा समान्य श्रेणी व अन्य पिछड़ा वर्ग श्रेणी में मेरिट में कोई विशेष अंतर नहीं रह गया है । एक प्रकार से उन्हें सामान्य श्रेणी की बराबरी करनी पड़ रही है , जिसमे वे कहीं भी नहीं टिकते हैं । दूसरी तरफ अनुसूचित जन जाति संवर्ग में मीणा समुदाय द्वारा बहुतायत मे उठाए जा रहे आरक्षण लाभ ने भी गुर्जर समाज को अनुसूचित जनजाति वर्ग में शामिल होने के लिए लालायित किया । और 2007 में उभरे गुर्जर समाज के आंदोलन में समाज को अनुसूचित जनजाति श्रेणी में आरक्षण देने की मांग रखी गई । वॉशिंगटन पोस्ट को दिये गए एक इंटरव्यू में गुर्जर नेता किरोड़ी सिंह बेंसला ने अनुसूचित जनजाति के आरक्षण में गुर्जर समाज को शामिल करने हेतु अपने तर्क में कहा था कि गुर्जर समाज के अधिकतर लोग अशिक्षित हैं तथा गरीबी में गुजर बसर कर रहे हैं । क्योंकि ओ बी सी श्रेणी के आरक्षण में उन्हें 123 जातियों के समूह  से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है , जिसमे उनका नंबर नहीं पड़ता है । परंतु यदि उन्हे अनुसूचित जनजाति वर्ग में शामिल कर लिया जाए तो उन्हे केवल 15 जातियों के समूह से ही प्रतिस्पर्धा करनी होगी । इसलिए उनकी अनुसूचित   जनजाति वर्ग में शामिल करने की मांग गुर्जर समाज के लिए लाभकारी रहेगी ,  हालांकि  अनुसूचित जनजाति में शामिल होने से उनका सामाजिक स्टेटस  नीचा हो जाएगा । परंतु गुर्जर समाज की अनुसूचित जनजाति वर्ग में शामिल करने की इस मांग ने मीणा समाज के भी कान खड़े कर दिये तथा मीणा समाज ने अपने अधिकार क्षेत्र में सेंध लगते देख गुर्जर आंदोलन का पुरजोर विरोध किया , जिसमे हुए टकराव में दो दर्जन व्यक्तियों को जान से हाथ धोना पड़ा । तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने जस्टिस चोपड़ा कमेटी का गठन कर गुर्जर आंदोलन को एकबारगी समाप्त करवाने में सफलता हासिल की ।   परंतु जब दिसम्बर , 2007  में जस्टिस चोपड़ा ने गुर्जरों को एस टी वर्ग में शामिल करने की मांग के पक्ष में फैसला  नहीं दिया , तो गुर्जर समाज ने 2008 में पुनः आंदोलन चलाया जो 2007 के मुक़ाबले अधिक उग्र था तथा इसे नियंत्रण में लाने के लिए सेना को बुलाना पड़ा था ।   परंतु इतने उग्र आंदोलन के बावजूद गुर्जरों को अनुसूचित जनजाति में शामिल करवाने में गुर्जर नेताओं को सफलता नहीं मिली और 2008 का आंदोलन तभी शांत हुआ जब तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने गुर्जरों को पाँच प्रतिशत का  अलग से स्पेशल आरक्षण का कोटा देने की सहमति जताई । इस आंदोलन में लगभग तीन दर्जन लोगों को जान गंवानी पड़ी थी । इस पाँच प्रतिशत के स्पेशल कोटा में गुर्जरों के साथ गड़िया लोहार , रेबारी ,बंजारा आदि को भी शामिल करने की सहमति बनी थी । साल 2008 में गुर्जर कोटा बिल राजस्थान विधान सभा में पारित भी कर दिया था , परंतु अक्तूबर , 2009 में राज्य के हाई कोर्ट ने पाँच प्रतिशत के इस स्पेशल बैक्वार्ड क्लास आरक्षण को स्टे कर दिया , क्योंकि इस स्पेशल आरक्षण से राज्य में आरक्षित पदों का प्रतिशत 50 फीसदी से अधिक हो गया था । तब तक राज्य में बदल कर आई कोंग्रेसी सरकार के मुखिया अशोक गहलोत , जो स्वयं भी एक पिछड़ी जाति से थे , ने गुर्जरों को आश्वासन दिया था कि उनकी सरकार कोर्ट के समक्ष पुरजोर से ,गुर्जर समुदाय को आरक्षदिलाने  की पैरवी करेगी । परंतु कोर्ट में 22 दिसम्बर ,2010 को फैसला होने से पहले ही गुर्जर समाज को काँग्रेस सरकार की मंशा पर शक होने लगा तथा उन्होने 20 दिसम्बर , 2010 से ही पुनः अपने नेता किरोड़ी सिंह बेंसला , रिटायर्ड कर्नल , के नेतृत्व में आंदोलन का रुख अपना लिया , जो लगभग 15 दिन तक रेल मार्ग व अन्य व्यवस्थाओं को बाधित करने के बाद सरकार द्वारा अपनाए गए नर्म रुख व मांगें माने जाने के वचन के साथ थमाव में परिणत हुआ ।
   वर्ष 2010 में राज्य के हाई कोर्ट ने ओ बी सी आयोग को आरक्षण पर पुनर्विचार के निर्देश दिये । आयोग ने साल 2012 में गुर्जरों सहित पाँच जातियों को स्पेशल बैक्वार्ड क्लास में पाँच प्रतिशत आरक्षण की सिफ़ारिश की । राज्य सरकार ने भी उपरोक्त सिफ़ारिश के आधार  पर इन पाँच जातियों को एस बी सी श्रेणी के तहत पाँच प्रतिशत के आरक्षण की अधिसूचना जारी कर दी । परंतु जनवरी , 2013 में हाई कोर्ट ने फिर से 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण सीमा पर रोक लगाकर इस एस बी सी आरक्षण पर पानी फेर दिया । वर्ष 2013 में फिर सत्ता में आई भाजपा सरकार ने गुर्जरों को अपने हक में करने के लिए वर्ष 2015 में गुर्जर समेत इन पाँच जातियों को पुनः विशेष पिछड़ा वर्ग में पाँच प्रतिशत आरक्षण देने के लिए आरक्षण अधिनियम -2015 पारित करवा कर इस आरक्षण का रास्ता दोबारा खोल दिया । परंतु 2015 के इस कानून के खिलाफ कैप्टन गुर्विन्दर सिंह तथा अन्य ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया , जिसके परिणामस्वरूप दिसम्बर ,2016 में एक बार फिर 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण न दिये जा सकने के तर्क के आधार पर हाई कोर्ट ने गुर्जरों समेत पाँच जातियों को मिले इस एस बी सी श्रेणी के आरक्षण को रद्द कर दिया। 
   क्या करेंगें गुर्जर अब ?
हालांकि राजस्थान सरकार ने गुर्जर समाज को आश्वासन दिया है कि हाई कोर्ट के इस फैसले के विरुद्ध सरकार सुप्रीम कोर्ट जाएगी और हर हालत में गुर्जर समाज को आरक्षण दिलाएगी । राज्य की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने कहा है कि एस बी सी आरक्षण मामले मे राज्य सरकार ने जो निर्णय किया है उससे पीछे हटने का कोई सवाल ही नहीं है । मुख्यमंत्री ने कहा कि गुर्जरों सहित सभी संबन्धित समाज के लोग सरकार पर विश्वास रखें , उनके हितों पर कोई आंच नहीं आने दी जाएगी ।
   परंतु गुर्जर आरक्षण के पुरोधा रिटायर्ड कर्नल किरोड़ी सिंह बेंसला कहते हैं कि हम न्यायपालिका का सम्मान करते हैं , लेकिन हमारे साथ अन्याय हुआ है । सरकार ने लापरवाही बरती है , इस मुद्दे को नवीं सूची में नहीं डाला । हम  चुप नहीं बैठेंगे ,हमारे हक के लिए संघर्ष करेंगे ।
 उधर गुजरात में पटेल आरक्षण आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल ने हिंडोन में कर्नल बेंसला से मुलाक़ात के बाद कहा कि अगर गुर्जरों को आंदोलन करना पड़ा तो गुजरात इस लड़ाई में आगे बढ़कर साथ देगा । पटेल ने कहा कि इस मामले में वे गुर्जर समाज के साथ हैं , उनकी जो मांग है वो पूरी होनी चाहिए । उन्होने कहा कि सरकार ने गुर्जर आरक्षण बिल को नवी सूची में डालने का आश्वासन दिया था , यह सरकार की लापरवाही है । अब सरकार ही इसका कोई हल निकाले ।
आखिर क्यों नहीं होता स्थायी समाधान ?
बार बार राजनीतिक पार्टियों द्वारा अपने राजनैतिक स्वार्थों की पूर्ति हेतु समाज के किसी एक वर्ग को किसी न किसी लाली पॉप के लोभ में अपनी तरफ लुभाने के कुचक्रों के परिणाम स्वरूप ऐसी असमंजस की स्थितियाँ पैदा होती हैं । कोई भी राजनैतिक पार्टी किसी भी समस्या का स्थायी हल नहीं निकालना चाहती । ये  पार्टियां इन मुद्दों को अपनी जरूरत के मुताबिक ढ़ोल पर खाल के रूप में मंढकर समय समय पर अपनी डफली के राग बजाती रहती हैं । समाज में भी कोई न कोई सामाजिक नेता इन पार्टियों के मक्कड़ जाल में आ ही फँसता है । कई बार राजनीतिक पार्टियों द्वारा स्वार्थ पूर्ति हेतु उछाला गया मुद्दा उनके अपने ही गले की फंस भी बन जाता है । वर्तमान गुर्जर आरक्षण का मामला भी अब राजस्थान सरकार के गले में हड्डी की तरह अटक गया है ।कोर्ट पचास फीसदी की सीमा को नहीं लांघने देना चाहते ,और सरकारें संविधान व सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की पूरी अनुपालना किए बिना  ही कागजी खाना पूर्ति करके काम चलाना चाहती हैं। वर्तमान मामले में गुर्जर नेताओं ने भी बिना सभी विकल्पों पर विचार किए ही केवल  आंदोलन की लाठी के सहारे लक्ष्य प्राप्ति के प्रयास किए लगते हैं । क्योंकि गुर्जर पहले से ही ओ बी सी श्रेणी के तहत 21 प्रतिशत के कोटे में शामिल थे ,यदि वो अपना आरक्षण का हिस्सा सुनिश्चित ही करना चाहते थे तो वे हरियाणा की तर्ज पर अपने लिए ओ बी सी के 21 प्रतिशत कोटे में ही 5 प्रतिशत का अलग से कोटा राज्य में निर्धारित करवाने हेतु सरकारों पर दबाब डालते तो उनका अलग से 5 प्रतिशत का कोटा भी निर्धारित हो जाता और 50 प्रतिशत से अधिक के आरक्षण की कोर्ट की बाधाएँ भी उनके सामने नहीं आती । उल्लेखनीए है कि हरियाणा में 27 प्रतिशत के ओ बी सी कोटे में बी सी(ए ) श्रेणी 16 प्रतिशत  तथा बी सी (बी )श्रेणी11 प्रतिशत की दो उपश्रेणियाँ बना कर बैक्वार्ड जतियों का आरक्षण सामंजस्य बनाया गया है । बी सी ब्लॉक ए (16%) में 72 जातियाँ तथा बी सी ब्लॉक बी (11%) में 6 जातियाँ राखी गई हैं । हरियाणा में भी जाटों को राजस्थान के  गुर्जरों  की तर्ज पर अलग से स्पेशल बैक्वार्ड आरक्षण का लाली पॉप दिया गया था ,  जो कोर्ट में धराशाही हो गया । और अब हरियाणा के जाट भी गुर्जरों की तरह मौसम के हिसाब से  यदा कदा आंदोलन की फटी बांसुरी बजाते रहते हैं , पर राजनैतिक पार्टियां तो वहाँ भी उसी तासीर की ही हैं ।
  अब गुर्जरों की मांग है कि उनके आरक्षण को नवीं सूची में रख कर पुख्ता किया जाये । क्या सरकार को पहले से नहीं पता था कि बिना नवीं सूची में आरक्षण को पारित करवाए गुर्जरों का एस बी सी का आरक्षण कोर्ट में जाते ही धराशाही हो जाएगा ? क्या सरकार के आला अधिकारी एवं कानूनविद इतनी सी बात को नहीं समझते हैं कि कैसे आरक्षण 50 फीसदी से ऊपर सही ठहराया जाएगा ?जब तक सरकारें साफ नीयत से सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिये गए फैसलों  सुझावों को आधार मानकर आरक्षण का निर्धारण नहीं करेंगी , तब तक यों ही सरकारों का खोखला तर्क धराशाही होता रहेगा और आरक्षण की मांग करने वाले वर्ग ठगे जाते रहेंगे तथा देश की संपति एवं कानून व्यवस्था यों ही इन आरक्षण आंदोलनों में स्वाहा होती रहेंगी । पर सरकारें  तो वायदे करती हैं  , वायदे हैं वायदों का क्या ?  ।