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Thursday, 22 June 2017
हैलो माइक टेस्टिंग -व्यंग्य -जग मोहन ठाकन
व्यंग्य
जग मोहन ठाकन
हैलो माईक टेस्टिंग , हैलो , हैलो
अभी २१ जून को सुबह सुबह हर रोज की तरह निकट के पार्क में घुसा तो देखा कई नए
नए लोग बाकायदा सुंदर सुंदर परिधान पहने पहले से ही पार्क की ठीक कोमल घास वाली जगह पर आसन जमाये पार्क की
सुबह की ताज़ी ओक्सिज़न युक्त प्राणवायु को चूसने की प्रतियोगिता में लीन हैं . अधिकतर
युवक युवती आधुनिक परिधान छोटी टी कट व इत्ती ही न्यूनतम संभव लोअर के आवरण में
भारत की प्राचीन परम्परा का निर्वहन करते योगी बनने का अभ्यास कर रहे हैं . पता
चला आज लोगों को योग के प्रति जागरूक किया
जा रहा है . तभी चौबे जी मिल गए , आते ही बिफर पड़े – सब ढकोसला है , जब भी कोई समस्या देश के संचालकों के सामने फन
उठाती है ये पब्लिक को दिग्भ्रमित करने के लिए कोई ना कोई मदारी वाली नई डुग डुगी
बजाने लगते हैं . बाजीगरों व सपेरों के खेल में अपनी विपदा भूलने वाली देश की
भोली- भाली जनता ताली बजा कर खुश हो जाती है और ये सपेरे अपने बोरों में काले
सांप पालने में कामयाब हो जाते हैं ताकि जरुरत पड़ने पर फिर इन्ही सांपों के सहारे
जनता को बहकाया जा सके . कभी ये सफ़ेद पोश
लोग अपने हाथों में इत्तर छिटकी झाड़ू लेकर
सेल्फी खींचकर मीडिया में छा जाते हैं , तो कभी लोगों को बैंकों की लाइनों
में लगने को विवश कर बैंक वालों से हाथ दो चार करवा कर खुद पाक साफ़ बन जाते हैं
. ये इन लोगों का जनता की नब्ज चेक करने
का हैलो माइक टेस्टिंग है.
पार्क में योगभक्त जन के चूसने के कारण कम हो चुकी ओक्सिज़न की वजह से चौबे जी के नथुने भी साँसों की रफ़्तार को बढ़ते देख फूलते जा रहे थे .
मैंने बीच में ही टोकना उचित समझा और कहा – चौबे जी चाहे कुछ भी कहो योग से
बड़े बड़े पेट वालों का वजन तो घटता है
. और यही वजन ही सब रोगों की जड़ है .
चौबे जी मंद मंद मुस्काये , बोले –ठीक पकड़े है . आज की सत्ता के शिखर पर बैठे
पुरोधा यही तो चाहते हैं , यही तो इनका एजेंडा है , कि वजन बढे तो केवल उनका ,
दूसरा कोई इनके समान वजन धारी ना हो जाए .
सुना है कि कुछ ‘शाह’ लोग ज्यादा ही वजनधारी होने लगे थे , पर समय रहते हमारे पारखी ‘ग्रीन टी’ वाले की नजर पड़ गयी और आज उनका लगभग बीस किलो वजन कम हो गया बताते
हैं . वजन कम करने की तकनीक में तो ग्रीन टी का कोई सानी नहीं है . कल तक जिनकी
‘वाणी’ में अदम्य ‘जोश’ था , आज उनका इतना कम वजन हो गया है कि कोई उनका वजन तौलने
तक राजी नहीं है . खैर समय समय की बात है . शिखर पर बैठने वाले वजनधारी तो होते ही
हैं . परन्तु यह भी सत्य है कि जो भारी भरकम
ग्लेसिअर कल तक हिमालय की चोटी पर बैठकर अकड़ दिखाते थे, वे आज फिसल कर धरातल पर
जगह ढूंढ रहे हैं और पत्थरों की ठोकरें उन्हें
चीर चीर कर पानी पानी कर रहीं हैं और वे गन्दला पानी हो चुके तथाकथित
ग्लेसिअर गंदे नालों में ठहराव के लिए तरस रहे हैं .
मुझे तो लगता है चौबे जी की बात में वजन है . परन्तु यदि किसी ग्रीन टी वाले की नजर पड़ गयी तो ---.
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Thursday, 8 June 2017
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व्यंग्य लेख
वरिष्ठ जाड़ का दर्द
जग मोहन ठाकन
पिछले कुछ दिनों से ‘‘वरिष्ठ जाड़ ’’ की सन्सटीविटी कुछ ज्यादा ही बढ़ गई थी । ठण्डा खाओ तो दर्द , गर्म खाओ तो दर्द । इतनी भारी भरकम गर्मी में शरीर कहता है कि कुछ ठण्डा पिया जाये वर्ना डिहाइडरेसन का खतरा बढ़ जाता है । जीभ कहती है कि कुछ कूल-कूल हो जाये । विवाह शादियों का मौसम है . मुश्किल से ऐसे हालात बने हैं कि लोग निमंत्रण देने लगे हैं .
वैसे भी कहा जाता है कि ना जाने घोड़े और आदमी के कब दिन फिर जाएँ. कब राजभवन में पग फेरा हो जाए . जाड़ की किस्मत का भी यही हाल है . पता नहीं लगता कब नत्थू चाय वाले के पत्थर से सख्त लड्डू खाने पड़ जाएँ और कब राजभवन से दावत आ जाये .
और हाल में तो एक बहुत बड़ी दावत मिलने के आसार भी दिख रहे हैं . अन्य जाड़ें किसी भी हालत में इस दावत से वंचित नहीं होना चाहती . सहयोगी जाड़ें चाहती हैं कि इस दावत में कोई ठण्डा मीठा रसगुल्ला सा चबा लिया जाये । पर निगौड़ी ‘‘वरिष्ठ जाड़” है कि ठण्डे के नाम पर ही बिदकती है । ना जाने क्यों वह अन्य जाड़ों से जलन महसूस कर रही है . अन्य जाड़ें वरिष्ठ जाड़ को समय समय पर आभास भी करा रही हैं कि वह अब खोखली व बेकार हो चुकी है .पर खास बात यह है कि वरिष्ठ जाड यह मानने को भी तैयार नहीं है कि वह खोखली हो गयी है और अब मुंह में वह अवांछित हो चुकी है. वह अब भी वरिष्ठता के नाम पर अहम् पद पाना चाहती है . जैसे ही कोई अहम् खाद्य दिखता है , यह जाड़ जीभ को लार टपकाने को बाध्य कर देती है . हालाँकि वरिष्ठ जाड़ को बार बार यह अहसास भी कराया जा रहा है कि वह अब और स्वादिष्ट व्यंजनों का लोभ ना करे और चुप चाप एक कोने में बैठकर अन्य जाड़ों को व्यंजनों का स्वाद लेने दे .
पर क्या करें वरिष्ठ जाड़ के अड़ियल रवैये के कारण सब परेशान हैं, मगर वरिष्ठता के आगे सभी नमन करते हैं। कोई पहल नहीं करना चाहता । आखिर कुछ भी ना खा पाने के कारण शरीर की हालत पतली होती जा रही है । जीभ की अध्यक्षता में सभी दांतों व जाड़ों की मिटिंग बुलाई गई । चर्चा छिड़ी कि यदि कुछ भी ना खाया पिया गया तो शरीर समाप्त हो जायेगा और जब शरीर ही नहीं रहेगा तो हम कहां रहेंगें। हमारा अस्तित्व तो शरीर से ही जुड़ा है । जिस दिन शरीर समाप्त , उसी दिन लोग तो राम नाम सत्य बोलकर शरीर को अग्नि की भेंट चढ़ा देंगें और साथ ही हो जायेगा हमारा भी होलिका दहन ।
आखिर शरीर को बचाना जरूरी था, इसलिए फैसला लिया गया कि दर्द वाली वरिष्ठ जाड़ को निकलवा दिया जाये । शरीर ने डाक्टर से सलाह ली । दन्त चिकित्सक ने बताया कि वैसे तो वरिष्ठ जाड़ को कई दिन से पायरिया ने घेर रखा है , पर हाल में तो एक खतरनाक ‘ बाबरी’ कीड़ा भी वरिष्ठ जाड़ को खोखली कर रहा है . डॉक्टर ने आगाह किया कि शरीर हित में वरिष्ठ जाड़ निकलवाना ही श्रेयष्कर है। इस पर सहयोगी जाड़ों ने शंका जाहिर की कि वरिष्ठ जाड़ को निकालने पर शरीर को तो दर्द होगा ही , खून भी बह सकता है । और फिर जो खाली जगह बन जायेगी वो भी भद्दी लगेगी । वरिष्ठ जाड़ का खालीपन भी अखरेगा । डॉक्टर ने सहयोगी जाड़ों की चिंता भांपकर तुरन्त कहा -तुम निश्चिंत रहो । मैं ऐसी मसालेदार जाड़ सैट कर दूंगा कि किसी को भी फर्क पता तक नहीं चलेगा । भोजन को ऐसे कुतरेगी कि बाकी सहयोगी जाड़ें भी तरसने लगेंगी । जहां तक खून बहने की बात है वो भी निराधार है। इतनी पुरानी व अन्दर से खोखली हो चुकी जाड़ को निकालने में ना कोई खून बहता है ना कोई दर्द होता है । बस दो दिन की दिक्कत है। फिर से शरीर को पुष्ट भोजन मिलने लगेगा और जीभ को नव-स्वाद । दो दिन बाद सब सामान्य हो जायेगा । सभी जाड़- दांतों व जीभ ने शरीर हित में निर्णय ले लिया । ‘‘ वरिष्ठ जाड़” डाक्टर के कचरादान में पड़ी सोच रही थी कहां चूक हो गई । नवीनतम घटनाक्रम के अनुसार चिकित्सक के सहायक ने वरिष्ठ जाड़ की वरिष्ठता पर तरस खाते हुए जाड़ को कचरे से उठाकर डॉक्टर के टेबल के पास लगी श्योकेस में एक जार में रख दिया है । अब वरिष्ठ जाड़ खुश है कि अब वो भी समय आने पर अन्य खोखली जाड़ों को निकलते देख सकेगी ।
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